Lucknow Loksabha Seat 2024: तहजीब और नजाकत के शहर लखनऊ में क्‍या रहेगा बीजेपी का कब्‍जा या सेंध लगा पाऐगें विपक्षी

Lucknow Loksabha Seat 2024: तहजीब और नजाकत के शहर लखनऊ में क्‍या रहेगा बीजेपी का कब्‍जा या सेंध लगा पाऐगें विपक्षी

Lucknow Loksabha Seat 2024: उत्‍तर प्रदेश का देश की सियासत में हमेशा से एक अहम स्‍‍थान रहा है. 80 लोकसभा सीटों की अगुवाई करते उत्‍तर प्रदेश ने अभी तक 9 प्रधानमंत्री देश को दिए हैं. जिनमें राजीव गांधी, चंद्रशेखर, वीपी सिंह, अटल बिहारी बाजपेई और चौधरी चरण सिंह शामिल है.लखनऊ संसदीय क्षेत्र यूपी की हॉट सीट में शुमार हैं.

लोकसभा चुनाव के पांचवें चरण की 14 सीटों के लिए प्रचार शनिवार शाम थम जाएगा. ये चरण काफी अहम है क्योंकि इसमें रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, राहुल गांधी और स्मृति ईरानी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. 20 मई को राजधानी लखनऊ में भी वोट डाले जाएंगे. आइए जानते हैं कि क्‍या हे नवाबों की नगरी का मिजाज……

Lucknow Loksabha Seat 2024: क्‍या है लखनऊ का सियासी इतिहास

गोमती नदी के किनारे बसे लखनऊ को नवाबों का शहर कहा जाता है. ऐसी मान्यता है कि इस शहर को भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण ने बसाया था तो कुछ लोग इसे लखन पासी के शहर के तौर पर भी जानते हैं. दशहरी आम, चिकन की कढ़ाई और कबाब के लिए विख्यात लखनऊ शहर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कर्मभूमि रही है और वह यहां से 5 बार सांसद चुने गए.

इनके अलावा देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित भी यहां से सांसद चुनी जा चुकी हैं. विजय लक्ष्मी पंडित को लखनऊ सीट का पहला सांसद होने का गौरव हासिल है. लखनऊ सीट पर अभी बीजेपी का कब्जा है और राजनाथ सिंह यहां से सांसद हैं. वह देश के रक्षा मंत्री भी हैं.

लखनऊ संसदीय सीट पर 2014 तक कुल 16 बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं जिसमें सबसे ज्यादा 7 बार बीजेपी और 6 बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है. इसके अलावा जनता दल, भारतीय लोकदल और निर्दलीय उम्मीदवारों ने एक-एक बार जीत दर्ज की थी.

लखनऊ लोकसभा सीट पर पहली बार 1952 में चुनाव हुए तो कांग्रेस से शिवराजवती नेहरू जीतकर पहली बार सांसद बनने का गौरव हासिल किया. इसके बाद कांग्रेस ने लगातार तीन बार जीत हासिल की थी, लेकिन 1967 के चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार आनंद नारायण ने जीत का परचम लहराया था. इसके बाद 1971 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस की शीला कौल सांसद बनीं थी.

 Lucknow Loksabha Seat 2024: बीजेपी का रहा है गढ़

लखनऊ संसदीय क्षेत्र बीजेपी का गढ़ रहा है. यहां पर सबसे ज्यादा बार बीजेपी चुनाव जीती है. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ सीट पर बीजेपी ने राजनाथ सिंह को मैदान में उतारा था. राजनाथ सिंह ने समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी पूनम सिन्हा को 3,47,302 मतों के अंतर से हरा दिया.

इससे पहले 2014 के चुनाव में भी लखनऊ सीट पर बीजेपी को जीत मिली थी. तब बीजेपी ने राजनाथ सिंह को मैदान को उतारा और उन्होंने कांग्रेस की प्रत्याशी रीता बहुगुणा जोशी को 2,72,749 मतों के अंतर से हराया था. राजनाथ सिंह को इस चुनाव में 57 फीसदी वोट मिले थे जबकि 2019 के चुनाव में भी उन्हें 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले.

Lucknow Loksabha Seat 2024: क्‍या है जातिगत समीकरण

लखनऊ लोकसभा क्षेत्र में 5 विधानसभा सीटें आती हैं. ये सीटें- लखनऊ पश्चिम, लखनऊ उत्तरी, लखनऊ पूर्वी, लखनऊ मध्य और लखनऊ कैंट हैं. लखनऊ के जातीय समीकरणों की बात करें तो यहां करीब 71 फीसदी आबादी हिंदू है. इसमें से भी 18 फीसदी आबादी राजपूत और ब्राह्मण हैं. ओबीसी 28 फीसदी और मुस्लिम 18 फीसदी हैं. साल 2022 में हुए चुनाव में पांच विधानसभा सीटों में से तीन पर भाजपा जीती थी और दो सीट सपा के पास है.
इसमें अगर जातिगत आधार की बात करें तो सबसे ज्यादा सामान्य और मुस्लिम समाज के मतदाता हैं. जिसमें ब्राह्मणों की संख्या अधिक है. इसके बाद मुस्लिम आबादी है, जिसमें शिया की संख्या ज्यादा है.

फिर वैश्य समाज के वोटर आते हैं इस सीट पर दलित और ओबीसी वोटर्स की संख्या सामान्य और मुस्लिम वर्ग की तुलना में बेहद कम है. लखनऊ लोकसभा सीट को बीजेपी का गढ़ कहा जाता है. 1991 से अब तक लखनऊ लोकसभा सीट पर बीजेपी का कब्जा है.

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Lucknow Loksabha Seat 2024: इतिहास में लखनऊ

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ एक एक बहुसांस्कृतिक शहर के रूप में भी जाना जाता है. इस शहर को नवाबों के शहर के अलावा पूर्व का गोल्डन सिटी, शिराज-ए-हिंद और भारत के कांस्टेंटिनोपल भी कहते हैं. शुजा-उदौला के बेटे असफ-उद-दौला ने साल 1775 में फैजाबाद से अपनी राजधानी लखनऊ शिफ्ट की. फिर इस शहर को देश के समृद्ध और शानदार शहरों में से एक बना दिया. लखनऊ शिया इस्लाम का एक अहम केंद्र माना जाता है जहां बड़ी संख्या में शिया मुस्लिम आबादी रहती है.

शुरुआत में अवध की राजधानी दिल्ली सल्तनत के नियंत्रण में थी, बाद में यह मुगल शासकों के अधीन आ गई. फिर अवध के नवाबों ने यहां पर शासन किया. 1856 में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस शहर को कब्जा करते हुए अवध शहर पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया और 1857 में ब्रिटिश राज में शामिल कर लिया.

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